कोरोना की उधेड़बुन

आज लॉकडाउन का 34वाँ दिन है। भारतीय जनता का लॉकडाउन में सहयोग अब तक काबिल-ए-तारिफ रहा है। ये आजाद भारत के इतिहास की पहली ऐसी त्रासदी है जिसने लोगों को घरों में बंद रहने को मजबूर कर दिया। ये आवश्यक भी है और वक्त की जरूरत भी परंतु यहाँ इस बात पर भी ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि क्या हमारे समाज के सबसे नीचे के तबके को उसके और उसके परिवार का पेट
भरने के लिए जो आवश्यक सहायता उस तक पहुंचनी थी  क्या वह उस तक पहुंच रही है? इस सवाल के जवाब में अलग-अलग तर्क दिए जा सकते हैं। हमें मालूम है इस मुश्किल की घड़ी में केंद्र तथा राज्य सरकार यथासंभव हर प्रयास कर रही हैं कि जरूरतमंदों को उनका हक मिले  परंतु फिर भी जिन लोगों को इन मूलभूत सुविधाओं का आवंटन करने का दायित्व सौंपा गया है वह अपने दायित्व का सही  तरह से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है  कि मैं यहां पर सामाजिक संस्थाओं की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि उन लोगों की बात कर रहा हूं जिनको सरकार ने इस काम के लिए चुना है।सरकारी उचित मूल्य की दुकान का भ्रष्टाचार किस से छिपा है, यहां अपना और अपने संबंधियों ( जान-पहचान वालों)  का पेट भरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। इस खेल में केवल इस सरकारी दुकान का संचालन करने वाले का ही केवल दोष नहीं है  बल्कि क्षेत्र के लालाओं का भी निरपेक्ष रूप से हाथ होता है और ऐसा नहीं है कि सरकारी तंत्र इससे अनजान है परंतु वह भी इसमें कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उसके भी कहीं ना कहीं इसमें हाथ सने हुए हैं। बात यहां पर यह है कि सामान्य परिस्थितियों में यह सब शायद  इन लोगों को  शोभा देता होगा परंतु विपत्ति काल में शायद यह उनकी नजर में भी निंदनीय कृत्य होना चाहिए। ये वक्त की जरूरत ही है कि समाज के सभी लोगों को आज हर एक उस इंसान की मदद करनी चाहिए जो मदद के लिए इस सभ्य समाज की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह जो समाज मदद के लिए देख रहा है वह एक ऐसा समाज है जो मांगने से ज्यादा मजदूरी करके कमाने में विश्वास रखता है परंतु आज एक ऐसी विपदा है जिसमें वह अपनी भुजाओं का भी प्रयोग जीविकोपार्जन के लिए नहीं कर सकता। वह इसी उधेड़बुन में फंसा हुआ है कि अगर बाहर जाए तो वक्त के हिसाब से अपराधी कहलाएगा  और घर पर रहे तो अपने बिलखते परिवार को मजबूर होकर देखता रहे। सच में हमें उस ढांचे की तरफ जाना होगा जिसमें सभी जरूरतमंदों को उनकी विपत्ति के समय उनके जरूरत का सामान मिल सके, एक ऐसा तंत्र जहां पर कोई भूखा ना सोए, एक ऐसी व्यवस्था जिसमें भूख,तपती हुई धूप में खाने की आस में ही दम न तोड़ दे। भगवान हमारे लोगों को इस विपत्ति को सहन करने की शक्ति दें और हमारे ही उन लोगों को सद्बुद्धि दे जो लोगों की भूख-प्यास से संबंधित कार्यों में लगे हुए हैं।



Comments

  1. कोरोना के नाम पर देश मे अनेक बिज़नेस, फ़िल्म इंडस्ट्री, शिक्षा, नौकरीयो और व्यक्तियों की जिंदगी बर्बाद हो गई जिसमें भारतीय मीडिया और राजनीति का बड़ा रोल रहा । भारत देश मे ब्लाइंड फॉलो करने की परंपरा को महत्व है और तार्किक होना पाप है ।

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