भसियागढ़
भारत वैसे तो पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से संपन्न है और भारत का एक राज्य मध्यप्रदेश अपने वन क्षेत्र के कारण अपने अंदर अद्भुत अतुलनीय प्राकृतिक शोभा समेटे हुए है। मध्यप्रदेश के
दक्षिण पूर्वी भाग में एक जिला बालाघाट है यह अपनी वन संपदा के कारण प्रदेश में खास स्थान रखता है ।बालाघाट से लगभग 50 किलोमीटर दूर एक तहसील है ,नाम है कटंगी। इस तहसील के अधिकांश लोग अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। कटंगी से लगभग 5 किलोमीटर दूर एक गांव है बिसापुर । पहाड़ों की तराई में बसा ये गांव वन संपदा और जल
संपदा दोनों से परिपूर्ण हैं। इसी गांव में दो पहाड़ों के बीच
एक शिव मंदिर है। गांव को पार करते हुए जब हम मंदिर की तरफ बढ़ते हैं तब गांव के अंतिम छोर में रहने वाले लोग और उनके घरों से परिचित होते हैं। भारत की खास बात है कि इसके हर कोनों में अलग अलग तरीके से बनने वाले घर होते हैं। यहां घर की छत खपरैल की है, परंतु यहां के लोग अपने जीवन में खुश हैं। रास्ते में जाते समय आपको बच्चे टायर के साथ खेलते हुए दिख सकते हैं। आगे बढ़ने पर मंदिर के रास्ते पर चलते हुए सड़क किनारे हम उन पेड़ों से भी परिचित हुए जिनसे हम अनभिज्ञ थे। यहां बहुत तरह के पेड़ों का समागम था। आगे बढ़ने पर देखते हैं कि पानी की धारा पहाड़ों से नीचे उतर कर रास्ते को काटते हुए आगे बढ़ रही है। भारत में एक परंपरा है कि मंदिर पर जाने से पहले पैरों और हाथों को धुला जाता है।
ये धारा मानो पैरों को धुल रही है। यहां ऐसी पानी की धाराएं आपको बरसात में बहुत ज्यादा देखने को मिल सकती है।
आगे बढ़ने पर एक छोटा सा पुल है । बाए हाथ पर कुआं है और सामने एक विशाल शिवलिंग के नीचे शिव मंदिर। कहा जाता है कि इस मंदिर में जो मूर्ति है वह स्वयं प्रकट हुई है। बाहर हनुमान जी के दर्शन करने के बाद हम मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं ,जहां पहले शिवलिंग पर जल चढ़ा कर नंदी देवता के दर्शन करते हैं अंदर गर्भ गृह में भगवान शिव की मूर्ति है त्रिशूल के साथ सजी मूर्ति अनुपम लगती है। अंदर पूजा करने के बाद हमने मां अन्नपूर्णा के दर्शन करें। मंदिर के दाएं हाथ पर जो पहाड़ है उस पहाड़ पर मां दुर्गा का मंदिर है जो पहाड़ के अंतिम भाग में है उसके बाद खाई और फिर पहाड़ लग जाता है। और मंदिर के बाएं हाथ में गोंड राजाओं की पत्थरों से बनी मूर्तियां है कहा जाता है यह उनकी बारात की झांकी है। कहावत के अनुसार जब गोंड राजाओं की बारात निकली थी तो सुबह होने पर वह सब पत्थरों में तब्दील हो गए। यह सब पहाड़ों के गोद में स्थित है। प्रकृति यहां अपने निर्मल स्वरूप में है। अगर इस स्थान को प्रशासन का सहयोग प्राप्त होता और संरक्षण प्राप्त होता तो यह भी एक दार्शनिक स्थल के रूप में विकसित होने की योग्यता रखता है। कटंगी अब रेल मार्ग से जुड़ रहा है बाहर के लोगों का भी इस रास्ते से गुजरना होगा। अगर Katangi रेलवे स्टेशन पर भी इस स्थान का बोर्ड पर जिक्र हो जाए तो इस स्थान का लोगों से भी परिचय हो जाएगा। जो लोग प्रकृति से प्रेम करते हैं उनके लिए यह जगह अद्भुत है और उनकी उम्मीदों पर खरा भी उतरेगी। यह जगह सभी ऋतु में आपको अलग एहसास कराएगी। बरसात में यह जगह अपनी उत्कृष्ट रूप में होती है। यहां कई लोग सावन के मास में अपनी मनोकामना को लेकर आते हैं। शिवरात्रि में भरने वाला मेला आसपास में प्रसिद्ध है। शिवरात्रि में यहां लोग मुंडन संस्कार के लिए दूर-दूर से आते हैं। शिवरात्रि में आने पर रास्ते में मिलने वाले पलाश के पेड़ों पर लगने वाले फूल लोगों को प्रफुल्लित करते हैं। वैसे तो लोगों की जानकारी में यह मंदिर भसियागढ़ कहलाता है और बिसापुर में स्थित है ,यह लगता है परंतु यह मंदिर सिवनी जिले के पेंच वन क्षेत्र में आता है। यहां वन्यजीव भी बहुत से हैं बाघ, चीता, तेंदुआ, हिरण ,भालू, बारहसिंघा ,नीलगाय आदि परंतु उन्होंने अभी तक इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाया है और ना ही इंसानों ने इन्हें।
कभी वक्त मिले तो भारत के साथ-साथ विदेशों के लोग भी यहां आकर शांति के कुछ पल गुजार सकते हैं। ठहरने के कुछ स्थान अब कटंगी में भी उपलब्ध होने लगे हैं। आशा करता हूं कि लोगों का इस स्थान पर फुटफाल बढ़ेगा और धरती के इस अनुपम उपहार को देखने का अवसर भी मिलेगा। कभी समय मिले तो आइए भसियागढ़..............
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